Sunday, June 15, 2014

कब्रिस्तान

गुज़रा एक कब्रिस्तान
के पास से
देखा कितनी शांती है
अंदर गया
बहुत सी कब्रें थीं

कई कब्रों पर
कुछ इबारतें भी लिखी थीं

एक कब्र पर लिखा था...

"किसी को क्या इलज़ाम दूं दोस्तो...,
ज़िन्दगी में सताने वाले भी अपने थे,
और दफनाने वाले भी अपने थे"...
हर किसी को मैं खुश रख सकूं वो सलीका मुझे नहीं आता,
जो मैं नहीं हूँ वो दिखने का तरीका मुझे नहीं आता..

'माँ'

राम लिखा, 
रेहमान लिखा;
गीता और कुरान लिखा;
जब बात हुई पूरी दुनियां को एक लफ्ज़ में लिखने की;
तब मैंने 'माँ' का नाम लिखा।

दादी माँ बनाती थी रोटी

दादी माँ बनाती थी रोटी 
🍪पहली गाय की , 
🍪आखरी कुत्ते की
🍪एक बामणी दादी की 
🍪एक मेथरानी बाई 
हर सुबह सांड आ जाता था
दरवाज़े पर गुड़ की डली के लिए
कबूतर का चुग्गा 
🐜किडियो का आटा
ग्यारस, अमावस, पूर्णिमा का सीधा
डाकौत का तेल
काली कुतिया के ब्याने पर तेल गुड़ का सीरा

सब कुछ निकल आता था
उस घर से ,
जिसमें विलासिता के नाम पर एक टेबल पंखा था...

आज 🎳 सामान से भरे  घर में
कुछ भी नहीं निकलता
सिवाय लड़ने की कर्कश 🙉 आवाजों के.......
....
मकान चाहे कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे...
चारपाई पर बैठते थे
पास पास रहते थे...
सोफे और डबल बेड आ गए
दूरियां हमारी बढा गए....
छतों पर अब न सोते हैं
बात बतंगड अब न होते हैं..
आंगन में वृक्ष थे
सांझे सुख दुख थे...
दरवाजा खुला रहता था
राही भी आ बैठता था...
कौवे भी कांवते थे
मेहमान आते जाते थे...
इक साइकिल ही पास था
फिर भी मेल जोल था...
रिश्ते निभाते थे
रूठते मनाते थे...
पैसा चाहे कम था
माथे पे ना गम था...
मकान चाहे कच्चे थे
रिश्ते सारे सच्चे थे...
अब शायद कुछ पा लिया है
पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया

“तारीख हज़ार
साल में बस इतनी
सी बदली है…
तब दौर
पत्थर का था
अब लोग
पत्थर के हैं..."

किनारे पर तैरने वाली
लाश को देखकर
ये समझ आया...
बोझ शरीर का नही
साँसों का था....
भगवान से वरदान माँगा
कि दुश्मनों से
पीछा छुड़वा दो, 
अचानक दोस्त
कम हो गए...